निकले थे घर
से
कुछ पाने कि
कोशिश करने
पर एक दिन
घर आने के
लिये भी
कोशिश करनी होगी,
पता न था..
कुछ सुलझाने चले थे
मगर
खुद इतना उलझ
जायेंगे, पता न
था..
हररोज गुजरते थे कभी
जहाँ से
वो राहे, वो चौराहा
आज बेगाना लगता है
अपनेही घर में
मेहमान बनना
किसे अच्छा लगता है
?
चार दिन यू
बीतते हैं
जैसे हाथों से फिसली
रेत हो
वक्त की चिडियाँ
ने जैसे
चुग लिया मेरा
सुहाना खेत हो..
घर की दीवारें
और वो प्यारी-सी आँखे
बिना बोले ही
हमें रोकती हैं
दिल अभी भरा
नहीं होता
और कंबक्त लौटने की
घडी टोंकती हैं..
दिल वादा करता
है उनसे-
अब आयेंगे तो ऐसे
आयेंगे
कि फिर से
जाना न हो
मिलेंगे तो ऐसे
मिलेंगे
कि फिर से
बिछडना न हो..
अपनी चीजों के साथ
कई बातें,कई यादें
समेटते है
घर को आँखों
में बसाके
फिर से उलझने
के लिये लौटते
है..
दिल कहता है-
थोडी मेहनत और
कर ले
ताकि वादा पूरा
कर पाए
हर बार घर
ना जा सके
तो किसी दिन
घरको ही साथ
ले आए..
इसीलिये तो बडी
शिद्दत से
एक-एक तिनका
वो जुटाता है
हर नया दिन
इसी ख्वाब पे लुटाता
है
घरोंदे की ताकत
से ही
पूरी दुनिया में उडता
परिंदा है..
घरोंदे के लिए
ही आखिर
वो छोडता घरोंदा है....!
- अमिता
