पर गुजरते हुए वक्त से बात हुई
बात क्या..बहस ही हुई...
हुआ यूँ ,कि उसने हमसे हिसाब माँ गा
और कहा- बहुत कुछ खोया है तुमने !
खोया होगा बहुत,
पर कुछ पाया भी तो है
वक्त ने साथ नहीं दिया तो क्या. .
कुछ लोग फिर भी साथ थे
मायूस करनेवाले होंगे कई
पर हौसला बढानेवालें भी कुछ हाथ थे
हाँ ,धूप में जलें होंगे पाँव
पर सिर पे ममता की छाँव नहीं देखी ?
हमें लड़खड़ाते हुए देखा तुमने
पर चलने की जिद नहीं देखी ?
किसी एक पल में इतना पाया..
प्यासे को मिलने जैसे समंदर आया..
उस विश्वास ने, ममता और प्यार ने, उन दुवाओंने
मांगा है कभी हिसाब ?
सूरज की किरणोंने, बरखा की बुंदोंने,
इठलाती हवा ने मांगा है कभी हिसाब ?
हम इन्सानों के बीच रहकर
तूने भी कर दी ना छोटी बात..?
तो सुन.." हम किताब पढनेवालों में से है
पन्ने गिननेवालें नहीं
सफर करनेवालों में से है
पीछे हटनेवालें नहीं
हमसे हिसाब मांगनेवाले..
खुद तेरा भी तो हिसाब हो रहा है
आखिर एक कल के जाने के बाद
एक और कल भी तो आ रहा है.."
बहस खत्म हुई दोस्तों,
अब वो शांति से जा रहा है
और जाते जाते हमसे
हल्का-सा मुस्कुरा रहा है...|
- अमिता

